(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.265. अध्यायः 265
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
पञ्चस्वपि पाण्डवेषु मृगयार्थे गतेषु सपरिजनेन सैन्धवेन मार्गवशात्तदाश्रमाभिगमनम् ॥ 1 ॥
तत्रद्रौपदीदर्शनक्षुभितहृदा जयद्रथेन तत्तत्वजिज्ञासया तन्निकटं प्रतिकोटिकाश्यस् प्रेषणम् ॥ 2 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-265-0x(2653)(26138)
तस्मिन्बहुमृगेऽरण्ये अटमाना महारथाः।
काम्यके भरतश्रेष्ठा विजह्वुस्ते यथामराः ॥ 3-265-1(26139)
प्रेक्षमाणा बहुविधान्वनोद्देशान्समन्ततः।
यथर्तुकालरम्याश्चवनराजीः सुषुष्पिताः ॥ 3-265-2(26140)
पाण्डवा मृगयाशीलाश्चरन्तस्तन्महद्वनम्।
विजह्नरिन्द्रप्रिमाः कंचित्कालमरिंदमाः ॥ 3-265-3(26141)
ततस्ते यौगपद्येन ययुः सर्वे चतुर्दिशम्।
मृगयां पुरुषव्याघ्रा ब्राह्मणार्थे परतपाः ॥ 3-265-4(26142)
द्रौपदीमाश्रमे न्यस् तृणबिन्दोरनुज्ञया।
महर्षेर्दीप्ततपसो घौम्यस्य च पुरोधसः ॥ 3-265-5(26143)
तस्तु राजा सिंधूनां वार्धक्षत्रिर्महायशाः।
विवाहकामः साल्वेयान्प्रयातः सोऽभवत्तदा ॥ 3-265-6(26144)
महता परिबर्हेण राजयोग्येन संवृतः।
राजभिर्बहुभिः सार्धमुपायात्काम्यकं च सः ॥ 3-265-7(26145)
तत्रापश्यत्प्रियां भार्यां पाण्डवानां यशस्विनीम्।
तिष्ठन्तीमाश्रमद्वारि द्रौपदीं निर्जने वने ॥ 3-265-8(26146)
विभ्राजमानां वपुषा बिभ्रतीं रूपमुत्तमम्।
भ्राजयन्तीं वनोद्देशं नीलाभ्रमिव विद्युतम् ॥ 3-265-9(26147)
अप्सरा देवकन्या वा माया वा देवनिर्मिता।
इतिकृत्वाञ्जलिं सर्वे ददृशृस्तामनिन्दिताम् ॥ 3-265-10(26148)
तः स राजा सिन्धूनां वार्धक्षत्रिर्जयद्रथः।
विस्मितस्त्वनवद्याङ्गीं दृष्ट्वा तां दुष्टमानसः ॥ 3-265-11(26149)
स कोटिकाश्यं राजानमब्रवीत्काममोहितः।
कस्य त्वेषाऽनवद्याङ्गी यदिवाऽपिन मानुषी ॥ 3-265-12(26150)
विवाहार्थो न मे कश्चिदिमां दृष्ट्वाऽतिमुन्दरीम्।
एतामेवाहमादाय गमिष्यामि स्वमालयम् ॥ 3-265-13(26151)
गच्छ जानीहि सौम्येमां कस्य वाऽत्र कुतोपि वा।
किमर्थमागता सुभ्रूरिदं कष्टकितं वनम् ॥ 3-265-14(26152)
अपि नाम वरारोहा मामेषा लोकसुन्दरी।
भजेदद्यायतापाङ्गी सुदती तनुमध्यमा ॥ 3-265-15(26153)
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्रियम्।
गच्छजानीहि कोन्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ॥ 3-265-16(26154)
स कोटिकाश्यस्तच्छ्रुत्वा रथात्प्रस्कन्द्य कुण्डली।
उपेत्यपप्रच्छ तदा क्रोष्टा व्याघ्रवधूमिव ॥ 3-265-17(26155)

इति श्रीमन्महाभारते अरण्यपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 265 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-265-7 परिबर्हेण परिच्छदेन ॥ 3-265-9 नीलाभ्रं नीलमेघम् ॥


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